शर्मनाक लापरवाही का नतीजा — हड़ताल के बीच ज़बरदस्ती कोयला ढुलाई का खेल बना भाजपा नेत्री के पति की मौत का कारण!
Artical by Shajad Ansari
बिलासपुर जोन ,कोरिया
पांडावपारा कोयला परिवहन में ज़बरदस्ती और प्रशासनिक हठधर्मिता ने एक घर का चिराग बुझा दिया।
महाप्रबंधक की मनमानी या साजिश? शांतिपूर्ण हड़ताल के बीच किसने दी प्रबंधक को ट्रकों चलने की इजाज़त?
भाजपा नेत्री श्रीमती संगीता गोयल के पति श्री संदीप गोयल की मौत ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश की आग भड़का दी है। नशे में धुत ट्रक चालक ने जब उन्हें दुकान के बाहर कुचल दिया, तब सबके मन में एक ही सवाल उठा — आखिर जब हड़ताल चल रही थी, तो ट्रक सड़क पर आया कैसे?
क्या महाप्रबंधक की छूट के बिना संभव था प्रबंधक का ट्रक चलवाना
हड़ताल के नियमों के अनुसार कोयला परिवहन पूरी तरह बंद था। ऐसे में सवाल उठता है — क्या महाप्रबंधक ने जानबूझकर ट्रांसपोर्टरों को ट्रकों के पहिए घुमाने की छूट दी?
क्या यह किसी ‘सामाजिक हत्या’ से कम है?
स्थानीय लोगों का साफ कहना है:
> “जब कर्मचारी शांति से आंदोलन कर रहे थे, तब कोयला ढुलाई करवा कर SECL ने खुद इस मौत को बुलाया है।”
क्या यह एक लापरवाही नहीं बल्कि प्रबंधन की ‘निर्दय साज़िश’ थी?
बार-बार चेतावनी देने के बावजूद, एसईसीएल प्रबंधन ने कोयला ढुलाई रोकने की जगह हड़ताल को तोड़ने की मंशा से ट्रकों को ज़बरदस्ती चलवाया। और नतीजा?
> एक मासूम की जान चली गई!
कहा जा रहा है कि जिस ट्रक ने संदीप गोयल को कुचला, वह न केवल ओवरलोड था, बल्कि उसका ड्राइवर नशे में भी था। ये सब किसी भी संवेदनशील प्रबंधन की विफलता की पराकाष्ठा है।
प्रशासन और प्रबंधन की चुप्पी = मौन स्वीकृति?
अब तक न कोई गिरफ्तारी, न कोई एफआईआर, न ही महाप्रबंधक से जवाबतलबी!
क्या इस चुप्पी में मिलीभगत छुपी है?
क्या SECL के अफसरों के लिए इंसानी जान की कीमत अब कोयले के ट्रकों से भी कम हो गई है?
परिजनों का सवाल – किसका दोषी सिर्फ चालक नहीं, आदेश देने वाला भी हत्यारा है!
शोकग्रस्त परिजनों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया है —
> “अगर ट्रकों को चलने की छूट नहीं दी जाती, तो आज संदीप जिंदा होते।”
यह केवल एक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि प्रशासनिक आतंक और ‘अधिकारी मानसिकता’ की खुली पोल है।
जनता की चार ज़रूरी माँगें:
1. महाप्रबंधक के खिलाफ लापरवाही की धाराओं में FIR दर्ज हो।
2. मृतक के परिवार को 1 करोड़ का मुआवजा और परिवार के सदस्य को स्थायी सरकारी नौकरी दी जाए।
3. नशे में धुत ट्रक चालक को तत्काल गिरफ्तार कर कठोर दंड दिया जाए।
4. हड़ताल के दौरान कोयला ढुलाई चालू करवाने वाले सभी जिम्मेदार अधिकारियों की स्वतंत्र जांच हो।
निष्कर्ष: अब चुप रहना मतलब अपराध में भागीदार बनना होगा!
यह हादसा नहीं, “व्यवस्था की बर्बर हत्या” है। जब एक शांतिपूर्ण हड़ताल के बीच प्रशासन खुद नियमों को तोड़े, तो कौन जिम्मेदार है?
अब जनता पूछ रही है—
“क्या अफसरशाही की लापरवाही पर कभी कोई कार्रवाई होगी, या मौतें सिर्फ आंकड़ों तक ही सीमित रहेंगी?”
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