सोनहत में उर्स कव्वाली को नहीं मिली अनुमति: क्या प्रशासनिक निर्णय पर सियासी साया? प्रदेशभर में हुए उर्स कार्यक्रम, पर कोरिया के सोनहत में कव्वाली को मिली रोक
कोरिया/सोनहत, 1 जून 2025
बाबा भोलनशाह मजार, जो वर्षों से सर्वधर्म सद्भाव का प्रतीक माना जाता रहा है, आज एक प्रशासनिक निर्णय के चलते सुर्खियों में है। सोनहत में हर वर्ष की तरह आयोजित होने वाले उर्स कार्यक्रम को लेकर इस बार कव्वाली आयोजन की अनुमति जिला प्रशासन द्वारा नहीं दी गई। पूरी तैयारी हो जाने के बाद प्रशासन ने आयोजन से महज दो दिन पहले आठ बिंदुओं का हवाला देकर कव्वाली कार्यक्रम को रद्द करने का निर्देश जारी किया गया, जबकि उर्स की अन्य तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थीं।
जहाँ एक ओर प्रदेश के अन्य हिस्सों में उर्स के अंतर्गत कव्वाली जैसे कार्यक्रम शांति और सौहार्द्र के साथ सम्पन्न हुए, वहीं सोनहत में प्रशासन की इस कार्रवाई ने सवालों की झड़ी लगा दी है। आयोजन समिति और मुस्लिम समाज के लोगों का कहना है कि इस निर्णय ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है और यह भेदभावपूर्ण रवैया दर्शाता है।
क्या प्रशासन ने दिखाई अक्षमता या बना रहा है बहाना?
प्रशासन द्वारा दिए गए आठ बिंदु जिस आधार पर कव्वाली की अनुमति निरस्त की गई, उन्हें लेकर व्यापक आलोचना हो रही है। आयोजन स्थल छोटा होना, रास्ता संकरा होना, असामाजिक तत्वों के उपद्रव की आशंका, पुलिस बल की कमी, और यहां तक कि हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को भी कारणों में गिनाया गया।
प्रश्न यह उठता है कि क्या सोनहत जैसे शांत क्षेत्र में आतंकी हमले की आड़ लेकर सद्भावना के एक धार्मिक आयोजन को रोका जाना उचित है? क्या प्रशासन सुरक्षा उपलब्ध कराने में अक्षम है या यह निर्णय किसी राजनीतिक दबाव का परिणाम है?
क्या किसी नेता के दबाव में बदली गई निर्णय की दिशा?
स्थानीय सूत्रों और आयोजन समिति से जुड़े लोगों का दावा है कि इस आयोजन को रोकने में किसी प्रभावशाली राजनेता की भूमिका हो सकती है। अब तक वर्षों से बिना किसी बाधा के सम्पन्न होते आ रहे इस आयोजन में पहली बार कव्वाली जैसे मुख्य कार्यक्रम को रोका गया है।
क्या यह धार्मिक आयोजन किसी राजनीतिक रेखा के नीचे दबा दिया गया? यदि अन्य जिलों में सुरक्षा बल की व्यवस्था कर कार्यक्रम कराए जा सकते हैं, तो कोरिया में यह संभव क्यों नहीं?
आहत समाज ने जताया विरोध, चादर चढ़ाने से किया इनकार
प्रशासन द्वारा कव्वाली को अनुमति न देने से नाराज़ मुस्लिम समुदाय ने अब विरोधस्वरूप चादर चढ़ाने के कार्यक्रम से भी किनारा कर लिया है। आयोजन समिति का कहना है कि जब कव्वाली जैसे पारंपरिक कार्यक्रम को खतरे का बहाना बनाकर रोका गया, तो चादर चढ़ाने की अनुमति भी उसी नियम के तहत रद्द की जाए।
समाज का कहना है कि यह फैसला आस्था और परंपरा दोनों का अपमान है। कार्यक्रम में हिन्दू समुदाय के लोग भी वर्षों से बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते आए हैं। यह सिर्फ मुस्लिम समाज नहीं बल्कि सामाजिक सौहार्द की भी अवहेलना है।
बाबा भोलनशाह मजार: एकता का प्रतीक, इतिहास की गवाही
सोनहत का यह ऐतिहासिक मजार रियासत काल से ही आस्था का केंद्र रहा है। बताया जाता है कि यहां पर सर्वप्रथम चादर रामदेव यादव के परिवार द्वारा चढ़ाई गई थी और बाद में 1970 से आरयू पाण्डेय के नेतृत्व में वार्षिक उर्स व कव्वाली का आयोजन प्रारंभ हुआ। तब से लेकर अब तक यह परंपरा अनवरत चल रही है।
यह मजार हमेशा से धार्मिक एकता और भाईचारे का प्रतीक रहा है, जहां सभी धर्मों के लोग अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। यही कारण है कि इस बार कार्यक्रम के रुकने से पूरे क्षेत्र में निराशा का माहौल है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से उठे सवाल
अब सवाल सीधे-सीधे जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर उठ रहे हैं। क्या प्रशासन सिर्फ कागज़ी सुरक्षा कारणों का हवाला देकर धार्मिक आयोजनों को रोक सकता है? क्या यह देश की धर्मनिरपेक्ष भावना के विरुद्ध नहीं है?
क्या यह कहना गलत होगा कि उर्स जैसे सद्भावना पूर्ण आयोजन को रोकना साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देना है? और यदि यह निर्णय किसी नेता के दबाव में लिया गया है तो यह लोकतंत्र और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों पर एक सवालिया निशान है।
निष्कर्ष: प्रशासनिक निर्णय या सियासी चाल?
सवाल बहुत हैं — जवाब कोई नहीं। लेकिन इतना तय है कि सोनहत में बाबा भोलनशाह की दरगाह पर आयोजित होने वाले उर्स के कव्वाली कार्यक्रम को रोके जाने से एक समुदाय ही नहीं, बल्कि एकता की वह परंपरा भी आहत हुई है जो इस क्षेत्र की पहचान रही है।
प्रशासन के इस निर्णय की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह तय होना चाहिए कि क्या हमारे देश में धार्मिक कार्यक्रम किसी के राजनीतिक समीकरण से छोटे हो सकते हैं?
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