बैकुंठपुर की उम्मीदों पर लगा ताला: शहरी रेलवे आरक्षण केंद्र बना वीरान भवन, जनता परेशान
Article by Shajad Ansari
बैकुंठपुर, छत्तीसगढ़।
कभी आमजन की सुविधा के लिए शुरू किया गया बैकुंठपुर शहरी रेलवे आरक्षण केंद्र अब वीरान पड़ा है। गेट पर ताला लटका हुआ है, अंदर सन्नाटा पसरा है और बाहर खड़े लोग उम्मीद लगाए खड़े रहते हैं — कि शायद आज टिकट मिल जाए! लेकिन उन्हें हर बार मायूसी ही हाथ लगती है।
यह वही केंद्र है जिसे चर्चा रेलवे स्टेशन से 12 किलोमीटर दूर होने के कारण यात्रियों को राहत देने के उद्देश्य से खोला गया था। लेकिन अब यह केंद्र बिना किसी पूर्व सूचना के बंद कर दिया गया है। न तो रेलवे विभाग ने कोई कारण बताया और न ही किसी वैकल्पिक व्यवस्था की घोषणा की गई। परिणामस्वरूप, शहरवासियों को टिकट के लिए फिर से दूरदराज के रेलवे स्टेशन का रुख करना पड़ रहा है।
नेता प्रतिपक्ष अन्नपूर्णा प्रभाकर सिंह का हस्तक्षेप
नगर पालिका परिषद बैकुंठपुर की नेता प्रतिपक्ष अन्नपूर्णा प्रभाकर सिंह ने इस गंभीर मुद्दे पर आवाज़ उठाते हुए कोरिया कलेक्टर और मंडल रेल प्रबंधक (दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, बिलासपुर मंडल) से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा,
"जिस आरक्षण केंद्र के शुरू होने पर शहरवासियों ने राहत की सांस ली थी, आज वही केंद्र बंद पड़ा है — यह न केवल प्रशासन की विफलता है, बल्कि जनता की उपेक्षा भी है।"
उन्होंने यह भी कहा कि यह सुविधा न केवल यात्रियों को समय और धन की बचत कराती थी, बल्कि बुजुर्गों, महिलाओं, छात्रों और व्यापारियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी थी। अब इसके बंद हो जाने से हर वर्ग परेशान है।
जनता का दर्द — धूप, पसीना और आधा दिन की परेशानी
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पहले जहां 10 मिनट में टिकट मिल जाता था, अब स्टेशन जाकर आधा दिन बर्बाद करना पड़ता है। परिवहन का खर्च, गर्मी और समय की बर्बादी ने आमजन को बेहाल कर दिया है।
प्रशासन से मांग
नेता प्रतिपक्ष अन्नपूर्णा प्रभाकर सिंह ने प्रशासन से निम्न मांगें की हैं:
1.शहरी रेलवे आरक्षण केंद्र को तत्काल पूर्व स्थान पर पुनः चालू किया जाए।
2.केंद्र में स्थायी कर्मचारियों की तैनाती की जाए ताकि सेवा निरंतर चल सके।
3.संचालन का स्पष्ट समय निर्धारित किया जाए जिससे नागरिक भ्रमित न हों।
उन्होंने सवाल उठाया —
"जब रेलवे की पटरियों पर ट्रेनें दौड़ रही हैं, तो फिर बैकुंठपुर शहर की उम्मीदों पर ताला क्यों पड़ा है?"
अब जनता पूछ रही है:
क्या शहरी सुविधाएं सिर्फ कागजों में सीमित रहेंगी?
क्या प्रशासन की उदासीनता के नीचे हमारी छोटी-छोटी ज़रूरतें दबती रहेंगी?
अब ज़रूरत है कि प्रशासन इस मुद्दे पर तुरंत संज्ञान ले और बंद पड़ी उम्मीदों को फिर से पटरी पर लाए।
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