बैकुंठपुर-शहर सजाने निकला प्रशासन, तो इंसाफ पीछे छूट गया, और बुलडोज़र गरीबों पर उतर आया
Artical by Shajad Ansari
बैकुंठपुर/कोरिया -07 फरवरी 2026
मुख्यमंत्री के संभावित दौरे को लेकर बैकुंठपुर प्रशासन जिस सक्रियता से सड़कों पर उतरा है, उसने व्यवस्था की चुस्ती से ज्यादा उसकी संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है। सौंदर्यीकरण और वीआईपी सुविधा के नाम पर की जा रही कार्रवाई में सबसे पहले निशाने पर वही लोग आए, जिनकी मेहनत से शहर की रोजमर्रा की रफ्तार चलती है।
छोटे ठेले-खोमचे और सीमित साधनों से जीवन यापन करने वाले दुकानदारों का कहना है कि उन्हें न तो पर्याप्त समय दिया गया, न ही प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी। जिन हाथों ने चुनाव के समय वोट डालकर सरकार और जनप्रतिनिधियों को कुर्सी तक पहुंचाया, उन्हीं हाथों की रोज़ी-रोटी सबसे पहले समेट दी गई। यह सवाल अब खुलकर उठ रहा है कि आखिर वीआईपी सुविधा की ऐसी कौन-सी मजबूरी है, जिसमें आम आदमी की आजीविका सबसे सस्ती हो जाती है?
कार्रवाई के दौरान न तो वैकल्पिक व्यवस्था की ठोस योजना दिखी और न ही मानवीय दृष्टिकोण। प्रशासन की फुर्ती नजर आई, लेकिन उस फुर्ती की दिशा ने कई सवाल खड़े कर दिए। जनता पूछ रही है—क्या प्रशासन, जिसे जनता का सेवक कहा जाता है, वही प्रशासन भेदभाव के तराजू पर फैसले करने लगा है? और क्या गरीबों की सेवा का मतलब सिर्फ आदेश सुनना और जगह खाली करना रह गया है?
इस पूरे मामले में जब मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) संजय दुबे से जवाब चाहा गया, तो वे सवालों से दूरी बनाते नजर आए। उन्होंने पूरे प्रकरण को एसडीएम के आदेशों से जोड़ते हुए स्वयं को केवल पालनकर्ता बताया। यह जवाब व्यवस्था को स्पष्ट करने के बजाय जिम्मेदारी को और धुंधला करता दिखाई दिया।
अब सवाल सिर्फ प्रशासन से नहीं, उस सोच से है जो सत्ता और व्यवस्था को दिशा देती है। जिन मंत्रियों और सरकार को जनता ने चुना, क्या उनकी नीतियों का असर ज़मीन पर इसी तरह दिखना चाहिए? क्या जनता के नाम पर बनी व्यवस्था में जनता ही सबसे असहज और असुरक्षित हो जाए—यही विकास है?