क्या कुर्सी के भूखों को समाज सेवक खटकने लगा? शहीद अशरफी की लोकप्रियता बनी भाजपा के कुछ दिग्गजों का डर
Artical by Shajad Ansari
बैकुंठपुर: राजनीति में जब अंधकार छाता है तो सबसे पहले उन दीपकों को बुझाया जाता है जो बरसों से संगठन को रोशन कर रहे होते हैं बैकुंठपुर में भाजपा के साथ भी यही हुआ है एक तरफ जहां पार्टी 'सबका साथ-साथ विकास' का नारा देती है वहीं दूसरी तरफ शहीद अशरफी जैसे जमीन से जुड़े, कर्मठ और लोकप्रिय समाज सेवक को जिस तरह अपमान का झुनझुना थमाया गया उसने पूरे क्षेत्र की जनता को आक्रोशित कर दिया है
भाजपा की बड़ी भूल शेर को पिंजरे में रखने की कोशिश?
शहीद अशरफी कोई मामूली नाम नहीं हैं बैकुंठपुर की गलियों में समाज सेवा का दूसरा नाम ही 'शहीद अशरफी' रहा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उनकी बढ़ती लोकप्रियता भाजपा के कुछ स्थानीय दिग्गजों की आंखों की किरकिरी बन गई थी? मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की लिस्ट से उनका नाम गायब होना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश की बू देता है
जाते जाते दिखा गए "शराफत का कद", भाजपा को दिखाया आईना
हैरानी की बात तो यह है कि जिस पार्टी ने उन्हें मानसिक ठेस पहुंचाई, जिसे उन्होंने अपना पूरा जीवन (होश संभालने से अब तक) समर्पित कर दिया, उसे छोड़ते समय भी उनके शब्द कड़वे नहीं थे। शहीद अशरफी ने वरिष्ठों का सम्मान कर यह साबित कर दिया कि "पार्टी छोटी हो सकती है, लेकिन उनका व्यक्तित्व हिमालय से भी ऊंचा है।" बिना किसी को भला-बुरा कहे, मुस्कुराहट के साथ इस्तीफा देना दरअसल भाजपा के उन नीति-निर्धारकों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जिन्होंने एक सच्चे सिपाही की कद्र नहीं की।
असर जो भाजपा की चूलें हिला देगा!
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि शाहिद अशरफी का जाना भाजपा के लिए सिर्फ एक कार्यकर्ता का जाना नहीं है, बल्कि उस वोट बैंक और भरोसे का टूटना है जिसे अशरफी ने अपनी समाज सेवा से सींचा था। क्या भाजपा को लगता है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को किनारे कर वह आगामी चुनाव जीत पाएगी? क्या अल्पसंख्यक मोर्चे की सक्रियता अब बैकुंठपुर में सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी? शहीद अशरफी ने तो अपना रास्ता चुन लिया, लेकिन बैकुंठपुर की जनता अब उस भाजपा से सवाल पूछ रही है जिसने अपने ही घर के चिराग को बुझाने की कोशिश की। यह इस्तीफा नहीं, बल्कि भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।