घमंड, गाली और गलीबाजी ले डूबी कुर्सी: खुद को कानून से ऊपर समझने वाला विवादित डीएफओ मनीष कश्यप आखिरकार नप गया, शासन ने तत्काल किया निलंबित
Artical by Shajad Ansari
जिला - एम. सी. बी - विगत कई वर्षों से विवादों, आरोपों और शिकायतों से घिरे एम.सी.बी ज़िले के डीएफओ मनीष कश्यप को आखिरकार अपनी ही ज़ुबान और मानसिकता भारी पड़ गई। खुद को कानून, सिस्टम और अफसरशाही से ऊपर समझने वाले इस अधिकारी की गलीबाज शैली ने अंततः उसकी कुर्सी छीन ली।
शासन के आदेश के मुताबिक, डीएफओ मनीष कश्यप ने अपने ही वरिष्ठ अधिकारी से दूरभाष पर बातचीत के दौरान अभद्र, अशोभनीय और गाली-गलौज भरी भाषा का इस्तेमाल किया। एक पढ़े-लिखे, प्रशिक्षित और जिम्मेदार अखिल भारतीय सेवा अधिकारी से जिस मर्यादा की उम्मीद होती है, वह इस मामले में पूरी तरह तार-तार होती नजर आई।
स्थानीय स्तर पर मनीष कश्यप का नाम कोई नया नहीं था। उनके कार्यकाल में लगातार विवाद, विरोध और असंतोष देखने को मिला। कई बार शिकायतें हुईं, कई बार सवाल उठे, लेकिन घमंड इस कदर हावी था कि उन्हें लगता था कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ऑनलाइन विरोध हो या ज़मीनी नाराज़गी—हर आवाज़ को दबाने की मानसिकता सामने आती रही।
आखिरकार वही हुआ जो अक्सर गलीबाज और अहंकारी अफसरों के साथ होता है—अपनी ही ज़ुबान उनकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई। शासन ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए अखिल भारतीय सेवा नियमों के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबन की कार्रवाई कर दी।
यह मामला सिर्फ एक डीएफओ के निलंबन का नहीं, बल्कि उस सोच पर तमाचा है जिसमें कुछ अफसर खुद को राजा समझ बैठते हैं। यह कार्रवाई साफ संदेश है कि कुर्सी स्थायी नहीं होती और कानून से ऊपर कोई नहीं होता।