चरचा - शहर के बीचों-बीच लाखों का डस्टबिन!

चरचा - शहर के बीचों-बीच लाखों का डस्टबिन!

Artical by Shajad Ansari 

शिवपुर-चरचा नगर पालिका क्षेत्र में लाखों रुपये की लागत से बना सौंदर्य पार्क आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। वार्ड नंबर 6 के समीप, शहर के बीचों-बीच स्थित यह पार्क प्रशासन की अनदेखी का शिकार हो चुका है। जिस उद्देश्य से इसका निर्माण हुआ था, वह आज सवालों के घेरे में है। क्या यह पार्क मनोरंजन और हरियाली के लिए बनाया गया था, या फिर जनता की मेहनत की गाढ़ी कमाई से लाखों रुपए खर्च कर एक महंगा डस्टबिन तैयार कर दिया गया?

आखिर अधूरा क्यों पड़ा यह प्रोजेक्ट?

नगर पालिका प्रशासन का रवैया हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। जब नई योजनाओं की बात आती है तो उनके लिए स्वीकृति भी तेजी से मिलती है और काम भी जल्द शुरू हो जाता है। लेकिन पुराने और अधूरे पड़े प्रोजेक्ट्स की सुध लेने वाला कोई नहीं है। वार्ड नंबर 6 के समीप शहर के बीचों-बीच स्थित यह सौंदर्य पार्क एक भव्य परियोजना के रूप में सोचा गया था, लेकिन यह अब सिर्फ गंदगी और लापरवाही का प्रतीक बन चुका है।

क्या यह जानबूझकर किया जा रहा है? क्या इस अधूरे प्रोजेक्ट के पीछे किसी बड़े खेल का पर्दा डाला गया है? क्या ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत से जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा सिर्फ फाइलों में घूमकर गायब हो जाता है?

सवाल उठता है – क्या सरकार की योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

हर साल सरकार नगर विकास योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये आवंटित करती है। ठेकेदारों को काम दिया जाता है, भुगतान किया जाता है, और फिर जैसे ही बजट क्लियर होता है, निर्माण कार्य ठप हो जाता है। क्या सरकार ने इसे बनवाने के बाद इस पर दोबारा ध्यान नहीं दिया? क्या नगर पालिका प्रशासन को यह दिखाई नहीं देता कि शहर के बीचों-बीच एक अधूरा पार्क बदहाली का शिकार हो रहा है?

क्या यह भ्रष्टाचार की नई मिसाल है?

पार्क के लिए जारी की गई रकम कहां गई? क्या यह रकम पूरी तरह से उपयोग में लाई गई? क्या अधिकारियों और ठेकेदारों ने अपना हिस्सा लेकर इसे अधूरा छोड़ दिया? अगर यह पार्क पूरा नहीं हुआ तो क्या यह घोटाले का संकेत नहीं देता?

सवाल यह उठता है कि – आखिर इसका जिम्मेदार कौन?

क्या नगर पालिका प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया?

क्या ठेकेदारों और अफसरों ने कमीशन लेकर फाइलें बंद कर दीं?

क्या शहर की जनता का पैसा सिर्फ कागजों में खर्च होता रहेगा?

क्या इस तरह की अधूरी योजनाएं भ्रष्टाचार की नई मिसाल नहीं हैं?

क्या यह योजनाबद्ध भ्रष्टाचार का हिस्सा है?

नगर पालिका के कई अन्य प्रोजेक्ट्स की तरह इस पार्क का भी हाल बेहाल है। यह कोई पहला मामला नहीं है जब जनता के पैसों से शुरू हुआ प्रोजेक्ट अधूरा छोड़ दिया गया हो। हर साल सरकार से करोड़ों की राशि नगर विकास योजनाओं के लिए आती है, लेकिन उसका सही उपयोग होता है या नहीं, यह देखने वाला कोई नहीं।

अगर यह भ्रष्टाचार नहीं तो फिर क्या है?

यदि पार्क के लिए बजट पास हुआ तो काम अधूरा क्यों पड़ा?

यदि ठेकेदार को पूरा भुगतान किया गया, तो फिर जनता को क्या मिला?

यदि प्रशासन को यह दिख नहीं रहा, तो क्या यह जानबूझकर अनदेखी की जा रही है?

अब शिवपुर-चरचा की जनता को तय करना है कि वह इस अन्याय के खिलाफ चुप बैठेगी या फिर अपनी आवाज उठाएगी